दिन ढलते ढलते
सूरज दिवाना होए
शाम की चादर तले
फिर तनहा ही वोह सोए
चाँदनी भी करे मेहसूस
उसकी तनहाईया
दिल छूता है छूता है
तेरी परछाईया
घने बादलो के पीछे
छुपती है कभी बारीश
मूँदी आँखो मे भी
गिली गिली सी ख्वाहिश
यादे सुनाती है
फिर तेरी कहानिया
दिल छूता है छूता है
तेरी परछाईया
न दिन न रात
न रोशनी न अंधेरा
साथ देता है तो
सिर्फ साया ही तेरा
अपना तो खैर खो गया कही
बीती सदिया, मै अब भी हू वही
वोही राह वोही मोड
भूल चुका हू लेकीन वोह गलिया
भीड मे भी अकेलापन है...
कानो मे गूँजती है खामोशिया
अब भी दिल करता है नाकाम कोशिश...
छूता है, छूता है, तेरी... परछाईया
के.पी. आर.

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