शहर के इस चकाचौंध से
अपने नींद का सौदा करते है
बस ज़िंदा है, ये जताने के लिए
पल पल यहाँ मरते है
अपने ही कंधों पे ढोंते है
उम्मीदों की अधमरी लाशें
माथे की शिकन में खोयी है जो,
वो राहें कौन कैसे तलाशे?
होंठों की हंसी न जाने कहाँ लापता है
बस माज़ी के पास ही तो दिल के अरमानों का पता
है
हर रोज़ न जाने क्यूँ ये हारी हुई बाज़ी खेलते
है
अपनी ही परछाई से मुँह मोड़ने वाले सिकंदर यहाँ
कोने कोने में मिलते है
सुकून तो सिर्फ़ किताबों, फ़लसफ़ों में दिखता
है
या फिर अगर पैसा हो जेबों में तो खरीद लो बाज़ारों में बिकता है
किस मंज़िल की तलाश में ऐसे भागादौड़ी मे
जीते है
इत्मिनान से तो भाई साहब यहाँ पे क़ब्रों में
मुर्दे ही सोते है
हंह.. शहर के इस चकाचौंध से
अपने नींद का सौदा करते है…
केपी आर

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