हम रातभर चाँद को
ताकते रहते है
दबे पाँव अफक पे
सूरज आ जाता है
नजाने क्यूँ हम
चाँद को
और सूरज हमे
चाहता है
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हाथ से छुटे
लमहों का
जाम बना के पी
गये दो घूँट मे
तब से वोह खुद के
साथ बैठे
अपना अकेलापन
मिटाते है
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देस बदलने चले थे
हम
उंगली पे स्याही
लगा के
दाग अच्छे है कह
दिया नेताजी ने
विरोधी पार्टी से
गठबंधन बना के
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सबक तो जिंदगी
सिखाती रही
सालों साल...
.
.
हम वैसे के वैसे
रह गये
पढे लिखे
"अनपढ"
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आप ने हमे
अनजान बना दिया
और हम ने
आप को जिंदगी
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मंज़िल से
ज़्यादा मजा
जब सफ़र देने लगे
तो हर राह मंज़िल
होती है
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वोह समझे
वोह मजबूरी थे
हमारी
और हमने उन्हे
जान बनाये रखा था
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हम ज़िंदा तो
रहते
उन्हें देख देख
के
पर वोह आँखों से
क़त्ल करते रहें
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येह चाँदनी रात
और तुम...
हां... और मै....
तुम्हारे दिल के
किसी कोने मे
खुद को रोशन कर
के
आँखों की चाँदनी
बनना चाहती हू
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इशारे तो वोह ना
समझे कभी
और दिल की बात
अल्फ़ाज़ समझाते
जब तक
बड़ी देर हो गयी
थी
नजाने क्यूँ
जताने से ज़्यादा
बताना जरुरी था
केपी आर
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