सोचा था मैने भी जिंदगी के बारे मे कुछ
हुआँ कुछ और ही..
देखना चाहा उसको ईतनी संजिदगी से
पर उसने मुझ पे न फरमाया कभी गौर भी
सोचा था हसूंगा दिल खोल के
हसती रही मुझ पे जिंदगी
आँसूओ को छुपाना चाहा पलको के पिछे
रुलाती रही जिंदगी
खुद मे ढूँढना चाहा आनेवाले कल को
हाथ की लकिरो मे उलझती रही जिंदगी
रिश्तो को माना था जिंदगी से बढकर
मारने पे तुली है जिंदगी
सपने सजाये थे खुली आँखो से
युही बिखरती रही जिंदगी
थमती नब्जो ने दिया था ईशारा
लेकीन ठुकरा के जिती रही जिंदगी
साथ छोड चुके थे ईन लब्जों का
खुद नज्म बनती रही जिंदगी
रहना चाहा था कभी कभी तनहा
पर साथ निभाती रही जिंदगी
जिया खुद के बलभूते पे..
न कुछ माँगा न ऊम्मीदे रखी जिंदगी से
फिर भी बहोत कुछ सिखाती रही जिंदगी
सोचा था मैने भी जिंदगी के बारे मे कुछ
पर...
खैर... येही है जिंदगी
कुणाल प्रकाश रुद्राके

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